रात का दर्ज़ी।।

सारी रातें पड़ी हैं अमावस सी मेरी वो दर्ज़ी जो इनमे चाँद तारे टांका करता था कही खो गया है शायद।। काले धागे समाप्त हो गए या अब उसकी झोली में कोई रौशन चाँद नही यही सोचता रहता हूं कुछ तो हो गया है शायद।। क्यों गुम हो गया वो अंधेरा छोड़ कर क्या वो... Continue Reading →

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पालना और अर्थी।

एक पालना था, एक अर्थी थी। एक सूखे काठ में जीव रमा था एक हरे बांस निर्जीव मरा था। एक झूल रहा था डोरी से दूजा हर बंधन तोड़ चला था। ये भाव बदलता पल पल में वो भावहीन निस्तब्ध पड़ा था। ये शोर मचा कर पास बुलाता वो क्रंदन - शोर में शांत पड़ा... Continue Reading →

हां ये ज़िन्दगी है..

अभी बैठना भी नही सीखा था हमने, और ये चलने लगी थी हंसना तो बाद में सीखा ये आते ही रोने लगी थी रोते मन को धीरे धीरे हंसना सिखलाती जाती है फिर हंसने - रोने का खेल निरंतर हमसे खेलती जाती है हां ये ज़िन्दगी है.. जो मौत से मिलने जाती है।। कहती है... Continue Reading →

​आ चल ज़रा मेरे साथ चल ले..

आ चल ज़रा मेरे साथ चल ले अपने गांव से फिर मुलाकात कर ले रेंगा, चला और दौड़ पड़ा तेरा भोला सा बचपन जहां उठा पलक-पट, आंखें खोल उस दृश्य का रसपान कर ले आ चल ज़रा मेरे साथ चल ले अपने गांव से फिर मुलाकात कर ले। मैदान खेल का जहां कभी था शोर,... Continue Reading →

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